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पीयुष ग्रन्थि (दिव्य दृष्टि) Pineal gland — मार्च 18, 2019

पीयुष ग्रन्थि (दिव्य दृष्टि) Pineal gland

दष्टि या आंख सभी प्राणियों में स्पष्ट रहती है जो प्रत्यक्ष है परन्तु इसका न मस्तिष्क (शिर/गुहा) में रहता है। इतना ही नहीं सभी प्रत्यक्ष अंगों के मूल (सूक्ष्म ग) मस्तिष्क में ही हैं। शरीरशास्त्री उन्हें जानते हैं, देखते हैं। सामान्यजन उन्हें न जानते हैं और न देख ही सकते हैं। असाधारण ज्ञान-विज्ञान वेत्ता को उन्हें न जानना ही चाहिये अन्यथा वह असामान्य नहीं है।

द्वापर युग के सुप्रसिद्ध महाभारत के भयंकर रण क्षेत्र में मोहग्रस्त अर्जुन को भगवान कृष्ण ने दिव्य चक्षु देकर अपना विराट शरीर दिखाया था, क्योंकि अर्जुन स्थल दष्टि से वास्तविक तथ्य को न देखने के कारण भगवान की आज्ञा को नहीं मान रहा था। अन्ततः भगवान को स्पष्ट कहना पड़ाः

दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य मे रूपमैश्वरम्।

अर्थात् मैं तुम्हें दिव्य दृष्टि दे रहा हूँ मेरा ईश्वरीय रूप देखो। (गीता अ. ११/८)

आयुर्वेद अथवा अन्यान्य स्थानों में विभिन्न नामों से इसका उल्लेख इस प्रकार है:

१- ध्यान चक्षु (चरक सूत्रस्थान १/१७ अथवा)

२- समाधि चक्षु (वही चक्रपाणि)

३- ज्ञान चक्षु ४- दिव्य दृष्टि (चक्रपाणि च. १८-२३ और गीता)

५- दिव्य चक्षु (गीता अ.११/८)

६- सूक्ष्म दृष्टि

७- तृतीय दृष्टि

तब सिव तीसर नयन उघारा।

चितवत काम भयउ जरि छारा।। (रामचरितमानस)

एक शब्द का एक ही अर्थ होता है परन्तु उसका प्रयोग कुछ भिन्न होता है। इसलिये प्रत्येक अवसर पर-स्थान पर शब्द शक्ति या उसकी उच्चारण शक्ति पर गम्भीर ध्यान देकर विचार करना चाहिये।

नाड़ी परीक्षा के लिये परीक्षक शुद्ध-बुद्ध-प्रबुद्ध रहेंगे तभी वाञ्छित सफलता मिलेगी। इसके लिये उनका देह और मन जितना ही स्वस्थ रहेगा सावधान रहेगा उतनी अधिक सफलता उन्हें मिलेगी। अर्ध रात्रि के बाद ब्राह्म मुहूर्त सर्वश्रेष्ठ है। विशेषत: रात्रि ३ बजे से सूर्योदय तक। इस काल में देह और मन (मस्तिष्क) अधिकतम पवित्र और सावधान रहता है। गीता (अनासक्ति योग) आदि के अनुसार यह संयम का जागरण काल है। सबसे आगे बढ़कर इस काल में दिव्यदृष्टि या पीनियल ग्रन्थि खुली रहती है। उपर्युक्त इसके पर्यायवाची नामों से पता चलेगा कि इस काल से बढ़कर अध्ययन काल अन्य नहीं। इसलिये प्रत्येक वैद्य, प्रत्येक व्यक्ति को इस समय चिन्तन मनन करना चाहिये और प्रात: स्नान ध्यान के पश्चात् रोगी सेवा आदि करनी चाहिये। इस तथ्य के पालन से बुद्धि प्रखर होती है।

ब्राह्म मुहुर्ते उत्तिष्ठेञ्जीर्णाजीर्णं निरूपयन्।

रक्षार्थमायुषः स्वस्थो………………….। (अष्टांग संग्रह सू. अ. ३)

समाचार-पत्र “दर्पण” लखनऊ से – युग-युग से पुराणों में शिवजी के तीसरे नेत्र का अद्भुत चमत्कारिक वर्णन संक्षेप में मिलता है। इसी नेत्र को दिव्य दृष्टि, सूक्ष्म दृष्टि, ज्ञान चक्षु एवं ध्यान चक्षु इत्यादि कहा गया है। इसका सर्वाधिक प्रचार रामायण की अद्भुली –

“तब सिव तीसर नयन उघारा। चितवत काम भयउ जरि छारा।।” से हुआ और लोगों ने इसे तमाम कोणों और नुख्त-ए-नजर से देखा। श्रीमद्भागवत् गीता में भी भगवान कृष्ण ने अर्जुन को दिव्य दृष्टि देकर अपना समग्र दर्शन या विश्वदर्शन कराया। इसका वैज्ञानिक और सफल प्रयोग आयुर्वेद के तथाकथित आदिकाल में तब हुआ जब इन्द्र के यहाँ से भारद्वाज ऋषि आयुर्वेद के मुख्य तीन हेतु, लिंग और औषधि को भली भांति पढ़कर आये, किन्तु इस लोक में अधिक शील और लोकोपयोगी बनाने के लिए इस दृष्टि का प्रयोग कर शब्द गुण, द्रव्य

और समवाय नामक षट्पदार्थों का ज्ञान किया। इसके पूर्व वेदों के तथाकथित कर्ता ब्रह्मा ने भी आकाश से वेदों के शब्दों को इसी प्रकार देखकर जाना था। आज के शारीर शास्त्र में इसको पीनियल ग्रन्थि कहा जाता है।

तीन दशक पूर्व वैज्ञानिक इसके अद्भुत कार्य से प्रायः अनभिज्ञ थे और इस ग्रन्थि को बेकार समझकर इसको उपेक्षित किया गया पर धीरे-धीरे जब इस पर शोध हुए तो इस पर पड़ी रहस्य की परतें हटने लगीं और वैज्ञानिकों द्वारा इस ग्रन्थि को सारे शरीर का संचालक एवं अद्भुत शक्ति का स्रोत माना गया। वैज्ञानिकों ने इस ग्रन्थि से उत्पन्न रस मेलाटोनिन को रोग एवं वृद्धावस्था का प्रतिरोधक माना है। सबसे आगे बढ़कर पाश्चात्य दर्शन के जनक मनीषी मूर्द्धन्य फ्रेन्च दार्शनिक डेकाटें ने सत्रहवीं शताब्दी में इसे आत्मा का प्रश्रय माना है। २१/१०/९३ के काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के प्राणिकी प्रत्यानुशीलन केन्द्र द्वारा आयोजित पीनियल ग्रन्थि और उसके मॉलिक्यूलर सिग्नल विषयक कार्यशाला में भी विश्व के मूर्धन्य वैज्ञानिकों ने इस सन्दर्भ में निम्नलिखित विचार व्यक्त किये: जर्मनी के वैज्ञानिक डॉ. डी. गुप्ता ने मेलाटोनिन की कार्यप्रणाली की तुलना रेडियो तरंगों से की जो संदेश भेजने एवं संदेश प्राप्त करने की दोहरी क्षमता रखती है। मेलाटोनिन की सूचनायें मुख्य नियन्त्रण कक्ष पीनियल में एकत्र होती हैं तथा वहां से नयी परिस्थिति के अनुरूप समझने और समायोजित होने के निर्देश जारी होते हैं। डॉ. गुप्ता ने कहा, मेलाटोनिन वह हारमोन भाषा है जिसके माध्यम से पीनियल ग्रन्थि शरीर के विभिन्न अंगों से संवाद करती है। जहाँ इटली के वैज्ञानिक डॉ. पीलिसोनी ने इसे कैन्सर के उपचार के लिए उपयोगी बताया है वहीं डा. पीयर दौली ने इसे वृद्धावस्था को अवरुद्ध करने में सक्षम माना है।) | युगों पूर्व भारतीय ऋषियों ने इसकी आकाश से शब्द ग्रहण करने की शक्ति से ऊपर इसे विश्व दर्शन आदि अगणित चमत्कारिक एवं अलौकिक शक्तियों का स्रोत माना था, जैसा गीता, रामायण आदि में स्पष्ट लिखा है। पर इसे योगियों एवं ऋषियों की अलौकिक शक्ति का ही परिणाम माना जाता है। युग सन्दर्भ में इसका चमत्कारिक उपयोग कैसे करें, यह स्पष्ट नहीं है।

जहाँ तक अनुमान है कि सर्वप्रथम भगवान कृष्ण ने श्रीमद्भागवत् गीता के अध्याय ११वें के श्लोक आठ में अर्जुन से स्पष्ट कहा है कि :

न तु मां शक्यसे द्रष्टुमनेनैव स्वचक्षुषा।

दिव्यं ददामि ते चक्षुः पश्य में योगमैश्वरम् ।।

अर्थात् तुम मुझे अपनी इस आँख से नहीं देख सकते। तुम्हें दिव्य दृष्टि दे रहा हूँ, मेरे ऐश्वर्य योग को देखो। भगवान कृष्ण ने अर्जुन को कैसे दिव्य चक्षु दिया इसका ज्ञान अभी तक नहीं हो सका है परन्तु गीता के अध्याय छ: के १३, १४ श्लोक में दिव्य चक्षु के प्रयोग की यह विधि बतायी है:

समं कायशिरोग्रीवं धारयनचलं स्थिरः।

सम्प्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चवानवलोकयन्।।

प्रशान्तात्मा विगतभीर्ब्रह्मचारिव्रते स्थितः। …

मनः संयम्य मचित्तो युक्तासीत्मत्परः॥

अर्थात् काय (शरीर नहीं) सिर एवं गर्दन को अचल कर दिशाओं की ओर न देखते हुए अपनी नासिका के अग्रभाग को अच्छी प्रकार देखते हुए-अच्छी तरह शान्त आत्मा भयरहित, ब्रह्मचारीव्रत में स्थित योगी, मन को भली भांति नियमित कर हमारे में (भगवान में) चित्त लगाकर हमें (भगवान कृष्ण में ) ध्यान लगाकर बैठे। मुझमें स्थित निर्वाण अर्थात् परमशान्ति (अशेष प्राप्तव्य शान्ति) को प्राप्त कर लेता है।

सूर्योदय के समय काशी में लेखक का अनुभव है कि चैलाजिनकुशोत्तर आसन (स्वच्छ पवित्र भूमि पर कुशासन, मृगचर्म या रेशमी आसन) पर बैठे दक्षिण दिशा की ओर मुखकर बैठने के पश्चात् नासिकाग्र पर दोनों दृष्टियों को स्थिर कर देखें। नासिकाग्र से शंकु के आकार का एक मनोरम प्रकाश निकलेगा जिसकी एक धारा नासावंश से सटी एवं दूसरी धारा उसके विपरीत ऊपरी दिशा पर होगी और तीसरी धारा भ्रूमध्य में खड़ी छड़ी के समान होगी जिसका निचला सिरा नासावंश से सटी धारा से और ऊपरी सिरा विपरीत सटा होगा। प्रकाश में मयूर चन्द्रिका के समान नीले चमकते हुए मनोरम अगणित कण दिखायी देंगे तत्क्षण आंख बन्द कर लें अन्यथा आंख निकल जाने के समान पीड़ा होगी। यह प्रकाश द्रष्टा को भाव विभोर कर देगा।

दिव्य दृष्टि से देखने पर काम और कामना जलकर क्षार हो जाती है फिर कोई इच्छा शेष नहीं रहती है। भगवान कृष्ण के उपर्युक्त वाक्य के सन्दर्भ में आधुनिक विज्ञान के निम्नलिखित शोध को विशेष महत्व देना चाहिये|

१- चर्मचक्षु के स्वाभाविक रूप से काम न करने पर नासिकामूल (ग्लैबिला) पीनियल ग्रन्थि के बीच में अन्धकार छा जाता है और चर्मचक्षु से अदृश्य किसी तांछित वस्तु को देखने की क्षमता उसमें आ जाती है। जैसा कि स्पष्ट अर्जुन को चर्मचक्षु से अदृश्य भगवान का योग ऐश्वर्य अथवा विराट दर्शन हुआ था।

आधुनिक वैज्ञानिकों के मत से यह भी स्पष्ट है कि अर्द्धरात्रि के बाद उपवृक्क उस का विसर्जन स्थिर रहता है जो पीनियल द्वारा नियन्त्रित होता है। यह रस स्टेटोइड के नाम से जाना जाता है। इस स्थिरता से मनुष्य शान्त और चिन्तनशील हो जाता है।

यह भी ज्ञातव्य है कि गीता के शब्दों में अर्द्धरात्रि के बाद संयमी जागता है और वह चिन्तन, मनन या ब्रह्मदर्शन करता है। ठीक २ बजे के बाद ब्राह्ममुहूर्त की गणना की जाती है, जिसमें श्रेष्ठतम अध्ययन एवं चिंतन-मनन होता है। प्राणियों के सोने के पश्चात् अर्द्धरात्रि में लोकशब्द आकाश में नहीं जाते हैं। परिणामतः आकाश में स्थित गन्दे शब्द नीचे बैठ जाते हैं। अतः अच्छे शब्द आसानी से जागृत संयमियों की दिव्य दृष्टि द्वारा ग्रहण किये जाते हैं। इसी कारण ब्राह्म मुहूर्त में जागना श्रेष्ठतम माना गया है।

२- पौराणिक गाथाओं में शिव जी द्वारा अपने तीसरे नेत्र का प्रयोग कर काम को भस्म करने का प्रसंग हमको मिलता है। आधुनिक विज्ञान को भी पीनियल ग्रन्थि में अन्त:फल एवं वृषणों को नियन्त्रित करने की अद्भुत क्षमता मिली है। पीनियल ग्रन्थि अन्तःफल और वृषण से उत्पन्न रस (ऐस्टरोजिन एवं टेस्टोटिरीन) को निकलने से रोकता है। परिणामतः कामवासना की उत्तेजना शान्त होती है, जो तुलसीदास के उपर्युक्त वाक्य को युग सन्दर्भ में मुखर करता है।

३- यह भी स्पष्ट है कि विभिन्न कालों या ऋतुओं का प्रभाव मानसिकताओं, भावनाओं, चेतनाओं, उत्तेजनाओं एवं जीवन-मरण के भावों पर पड़ता है। ये भाव हमारी पीनियल ग्रन्थि एवं उसके समीपवर्ती क्षेत्रों से प्रभावित होते हैं।

4- आधुनिक विज्ञान में यह भी स्पष्ट है कि पीनियल और उसके आसपास की क्षेत्र जो नाड़ियों द्वारा आपस में गुथा हुआ है उत्तेजना, चिंतन, जीवन-मरण को नियन्त्रित करता है पर इस पर आगे शोध होना अति आवश्यक है ताकि हमारे प्राचीन ग्रन्थों से प्राप्त संदेश युगसंदर्भ में भी प्रेरणा देता रहे।

अन्ततः कुल मिलाकर हमारी यह धारणा है कि पौराणिक ग्रन्थों में दिव्य दृष्टि या सूक्ष्म दृष्टि का वर्णन मात्र कपोलकल्पित नहीं है। आज के आधुनिक विज्ञान ने भी अपने अनुसन्धान द्वारा इसको चरितार्थ किया है पर इस पर अभी और शोध की आवश्यकता है जिससे पीनियल ग्रन्थि की अद्भुत कार्य क्षमता से विश्व लाभ उठाये।

ओर वेदों, आयुर्वेद, शास्त्रों, पुराणों और स्मृतियों में ऐसे अगणित तथ्य हैं। जिनसे युगसन्दर्भ में मानवीय चेतना, प्रेरणा और ऊर्जा में मंगलमय वृद्धि होगी।

 

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त्रिफला से कायाकल्प — नवम्बर 27, 2018

त्रिफला से कायाकल्प

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त्रिफला शब्द की बात करें तो इसका अर्थ होता है तीन फल दरअसल त्रिफला तीन ऐसे फलों को मिलाकर बनाया जाता है जो अद्वितीय गुणों से भरपूर है। इसमें पहला हरड़, दूसरा बहेड़ा और तीसरा आंवला। आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों मे इसको हरितीकी, विभीतक और अमलकी कहा जाता है। त्रिफला बनाने के लिए इन तीनों की गुठली निकाल कर् चूर्ण बनाकर आपस में मिलाया जाता है। त्रिफला चूर्ण का विधिवत सेवन अमृत तुल्य है और कायाकल्प में समर्थ है। यह वात पित्त कफ त्रिदोष नाशक रसायन है। भारत में 3000 साल पहले एक ऋषि हुए हैं उनका नाम था वाग्भट। उन्होंने एक किताब लिखी जिसका नाम है अष्टांग हृदयम। वाग्भट ऋषि 135 साल की आयु तक जीवित रहे थे। अष्टांग हृदय में वाग्भट्ट जी कहते हैं कि जिंदगी में वात पित्त और कफ् संतुलित रखना ही सबसे अच्छी कला है और सारी जिंदगी प्रयास पूर्वक आपको एक ही काम करना है कि हमारा वात, पित और कफ् नियमित रहे, संतुलित रहे और सुरक्षित रहेा। जितना चाहिए उतना वात रहे, जितना चाहिए उतना पित रहे और जितना चाहिए उतना कफ् रहे।

त्रिफला बनाने की विधि –
दो तोला हरड़ बड़ी मंगाय। तासु दुगुन बहेड़ा लाय।।
और चतुर गुण मेरे मीता। डाल आंवला परम पुनीता।।
कूट छान या विधि से खाए। ता के रोग सर्व कट जाए।।

वैसे तो त्रिफला तीन प्रकार से तैयार किया जाता है।
नंबर (एक) त्रिफला जो बाजार में मिलता है वह समान अनुपात में मिलाया हुआ होता है, यानी तीनो हरितीकी, विभीतक और अमलकी बराबर मात्रा में होते हैं। यह त्रिफला मोटापे में सबसे अच्छा काम करता है।
नंबर (दो) त्रिफला 1ः2ः3 भाग वाला यानी 1 भाग हरड़, 2 भाग बहेड़ा और 3 आंवला होता है। यह त्रिफला कोई भी ले सकता है।
नंबर (तीसरा) त्रिफला 1ः2ः4 की मात्रा का होता है जो अनुपान के साथ खाया जाता है। अनुपान के साथ खाए जाने वाले त्रिफला के अंदर 1 भाग हरड़, 2 भाग बहेड़ा और 4 आंवला होता है। यह त्रिफला कायाकल्प करने के लिए रामबाण औषधि है।

गव्य त्रिफला –
गव्य त्रिफला बनाने के लिए सबसे पहले हरड़ को गोमूत्र छार में 21 दिनों के लिए भिगोया जाता है। बहेड़ा को 14 दिन के लिए गोमूत्र छार में भिगोया जाता है। आंवला को 7 दिन के लिए गोमूत्र छार में भिगोया जाता है। फिर इन तीनों कोगोमूत्र छार में से बाहर निकाल कर धूप में अच्छी तरह से सुखाया जाता है। सूखने के बाद अलग अलग पीसकर कपड़ छान चूर्ण बनाकर उपरोक्त विधि अनुसार मिलाया जाता है। इस विधि से बनाया गया त्रिफला उपरोक्त विधि से बनाए गए त्रिफला से 20 गुना अधिक ताकतवर होता है। इसे गोमूत्र में भावित करना भी कहते हैं।

त्रिफला की मात्रा निर्धारण –
आयुष के वर्ष प्रमाण। खाएं तोल रत्ती समान।।
ठीक यही अनुमान। वर्षों जितनी रति जान।।
सुबह उठकर हाथ मुंह धोने और खुला करने के बाद खाली पेट त्रिफला चूर्ण ताजे पानी के साथ प्रतिदिन केवल एक बार ले। मात्रा बच्चे हो या बड़े यानी जितनी उम्र होती है उतने रत्ती। यदि 8 साल की उम्र है तो 8 रत्ती। 8 रत्ती का 1 ग्राम होता है। त्रिफला सेवन के बाद 1 घंटे तक कोई भी चाय नाश्ता या खाना नहीं ले। 1 घंटे तक पानी के अलावा कुछ नहीं लेना चाहिए। एक दो तीर बार पतली दस्त भी लग सकती है। यह त्रिफला विभिन्न ऋतु में अलग-अलग अनुपान के साथ खाया जाता है।

सदैव निरोग रहने के लिए और कायाकल्प के इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि वे त्रिफला चूर्ण बाजार से कभी नहीं खरीदे बल्कि उपरोक्त विधि से स्वयं अपने घर पर ही एक बार इकट्ठा बनाकर 4 महीने तक उपयोग मे लाए। चार महीने बाद चूर्ण इतना प्रभावी नहीं रहता। पूर्णतया कायाकल्प के लिए त्रिफला चूर्ण 12 वर्ष तक नियमित रूप लेने का विधान है। जो व्यक्ति त्रिफला चूर्ण 12 वर्ष तक लगातार ले लेता है उसका पूर्ण रूप से कायाकल्प हो जाता है।

भिन्न-भिन्न ऋतुओं में त्रिफला सेवन विधि –
सहद चेत बैसाख बताइयो। जेठ आषाढ़ गुड़ा सु खायो।।
सावन भादो सेंधा नमक। कार्तिक कुवार खांड के संग।।
अगहन पूस सोंठ के साथ। पीपल माघ फगुन विख्यात।।

चैत्र तथा वैशाख यानी वसंत ऋतु में शहद के साथ खाया जाता है। शहद इतनी मात्रा में लेना चाहिए जितने मे अवलेह आसानी से बन जाए। जेठ तथा आषाढ़ यानी ग्रीष्म ऋतु में गुड़ के साथ खाना होता है। गुड त्रिफला के चूर्ण का चौथा भाग होना चाहिए। सावन तथा भादो वर्षा ऋतु में सेंधा नमक के साथ में खाना चाहिए। नमक त्रिफला चूर्ण का 8 वा भाग होना चाहिए। अश्विन और कार्तिक में देसी खांड के साथ खाना चाहिए। देसी खांड त्रिफला चूर्ण की 6 वा भाग होनी चाहिए। अगहन पूस सोंठ चूर्ण के साथ खाना चाहिए। सोंठ त्रिफला चूर्ण का 8 वा भाग होना चाहिए। माघ और फागुन में पीपल के साथ में खाना चाहिए। पीपल त्रिफला चूर्ण का 8 वा भाग होना चाहिए।

अनुमान के साथ त्रिफला खाने के लाभ –
प्रथम वर्ष तन सुस्ती जाए। द्वितीय रोग सर्व मिट जाए।।
तृतीय नयन बहु ज्योति समावे। चौथे सुंदरताई आवे।।
पंचम वर्ष बुद्धि अधिकाई। षस्टम महाबली होई जाई।।
केस श्वेत श्याम हुई सप्तम। वृद्ध तन तरुण होई पुनः अष्टम।।
दिन में तारे दिखे सही। नवम वर्ष फल अस्तुत कहीं।।
दशम शारदा कंठ विराजे। अंधकार हृदय का भाजे।।
जो एकादश द्वादश खाए। ताको वचन सिद्ध हो जाए।।

त्रिफला उपरोक्त विधि से लगातार 12 वर्ष तक यदि कोई खाता है तो पहले वर्ष मे सुस्ती दूर भाग जाती है। दूसरे वर्ष मे सभी रोगों का नाश होता है। तीसरे वर्ष मे नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। चौथे वर्ष मे चेहरे पर निखार आता है। पांचवे वर्ष मे बुद्धि का विकास होता है। छठे वर्ष मे बल की वृद्धि होती है। सातवें वर्ष मे सफेद बाल काले होते हैं। आठवें वर्ष मे व्यक्ति युवा बन जाता है। नो वे वर्ष में दिन में तारे स्पष्ट दिखने लगते हैं। दसवे वर्ष कंठ में सरस्वती का वास हो जाता है एवं हृदय में प्रकाश की अनुभूति होती है। 11 व 12 वे वर्ष बरस में वचनसिद्धि प्राप्त हो जाती है। अर्थात सेवन करने वाला व्यक्ति इतना समर्थ हो जाता है कि जो भी वचन बोले खाली नहीं रहता बल्कि सत्य सिद्ध होता है। इसी बात को उपरोक्त कविता के रूप में भी कहा गया है।

उपरोक्त गिनाए गए लाभ भले ही आज अतिशयोक्ति पूर्ण लगे परंतु इतना जरूर है कि वास्तविक लाभ कायाकल्प के समकक्ष होते हैं। अर्थात शरीर में कैसी भी बीमारी हो स्थाई रूप से ठीक हो जाती है और व्यक्ति मृत से युवा जैसा हो जाता है।

लेखक –
गव्यसिद्ध डॉक्टर जोराराम खोजा
अध्यक्ष गौ परिषद ( अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन)
पंचगव्य अनुसंधान आश्रम( गुरुकुल)

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एडवांस डिप्लोमा इन पंचगव्य थेरेपी — नवम्बर 22, 2018

एडवांस डिप्लोमा इन पंचगव्य थेरेपी

*एडवांस डिप्लोमा इन पंचएडवांस डिप्लोमा इन पंचगव्य थेरेपीगव्य थेरेपी*
यदि एडवांस डिप्लोमा करना चाहते हैं तो *पंचगव्यानुसंधान आश्रम* गौ परिषद द्वारा यह डिप्लोमा करवाया जाता है। गौ परिषद एक अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन है एवं भारत सरकार के संसदीय बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त कोर्स हैl यदि आप हमारे  यहां से एडवांस पडिप्लोमा इन पंचगव्य  का कोर्स करते हैं तो हम आपको 100% जॉब की गारंटी देते हैं। यानी आप कोर्स करके हमारे से जुड़ी हुई गौशालाओं में पंचगव्य के सेंटर खुले हुए हैं उसमें कार्य कर सकते हैं एवं अच्छा मानदेय पा सकते हैं। यदि कोर्स करने के बाद आप अच्छे से एक्सपीरियंस लेना चाहते हैं तो 6 महीने तक हमारे पास रहकर आप हर चीज को बारीकी से सीख सकते हैं। जिसका कोई शुल्क नहीं होगा यानी खाना पीना रहना सभी खर्च गौ परिषद उठाएगा। गौ परिषद द्वारा आयुष डिपार्मेंट एवं FSSAI से लाइसेंस की प्रक्रिया चल रही है। लाईसेंस मिलने के बाद आप जो भी पंचगव्य उत्पाद बनाएंगे हमारे साथ जुड़कर वह मार्केट में किसी भी मेडिकल स्टोर पर बेच सकते हैं। यदि आपके पास और भी अधिक पंचगव्य औषधि बनती है और इतनी खपत नहीं है तो वह भी हमें दे सकते हैं। जो लोग हमारे साथ जुड़े हुए होंगे उन्हीं को ही देंगे स्टोर खोलने की परमिशन देंगे। हमारे साथ जुड़े हुए लोगों के साथ जुड़े हुए लोगों के साथ हम हमेशा कंधे से कंधा मिलाकर खड़े रहेगें और हर कानूनी अड़चनों में उसके साथ रहेगें। कई जगह पर सोशल मीडिया पर यह मेसेज मास्टर डिप्लोमा इन पंचगव्य थेरेपी के नाम से चला रहे हैं जबकि इसका एक साल पहले भारत सरकार ने परिवर्तन करके एडवांस डिप्लोमा इन पंचगव्य थेरेपी कर दिया है। यह कोर्स कई लोग अपनी अलग अलग रेट में करवाते हैं, तो उससे हमें कोई आपत्ति नहीं है। जिसको जितने में करवाना है वह करवाएं। हमारी रेट जो खर्चा आता है वह खर्चा ₹24500 है जिसके अंदर गौ परिषद की आजीवन सदस्यता, भारत सेवक समाज का आजीवन आईडी कार्ड, परीक्षा शुल्क, प्रैक्टिकल शुल्क एवं भोजन तथा आवास की व्यवस्था इसके साथ में संलग्न है। इसके अलावा कोई भी शुल्क नहीं है। जो भी यह कोर्स करना चाहते हैं वो अच्छी तरह से सोच समझ कर व सभी तरह से जांच परख कर ही कोर्स करें। क्योंकि कोर्स करवाने में कोई ज्यादा खर्च नहीं है बाकी सभी सारी सुविधाएं देने में भी काफी सारा खर्च आता है।जो आप यह फीस देते हैं और उसमें से जो पैसा बचता है वह भी किसी की जेब में नहीं जाता है इसी में खर्च होता है और गौ माता के लिए ही खर्च होता है। इसलिए आप कभी यह मत सोचना कि वह पैसा किस काम में जाता होगा।
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1• पंचगव्य परिचय।
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पंचगव्य कोर्स की कानूनी मान्यता — अक्टूबर 20, 2018

पंचगव्य कोर्स की कानूनी मान्यता

      MD Panchgavya Benar                  पंचगव्यानुसंधान आश्रम (गुरुकुल)गौ परिषद द्वारा निर्धारित पाठ्यक्रम एडवांस डिप्लोमा इन पंचगव्य थेरेपी जो कि  भारत सरकार के संसदीय बोर्ड द्वारा मान्यता प्राप्त एक वर्ष का डिप्लोमा कोर्स है। वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति मे अभ्यास भारतीय संविधान की धारा 19(1) एवं धारा 19(6) के अंतर्गत पूर्णतह वेद है। वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति में अभ्यास  करना इंडियन मेडिकल काउंसिल के दायरे में नहीं आता है। इसलिए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया के पत्र क्रमांक एम.सी.आई.-34-(1)/96.med./10984, दिनांक 05-08-1996 के अनुसार वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति में अभ्यास करने के लिए मेडिकल काउंसिल ऑफ इंडिया से अलग से आज्ञा/पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है। पुलिस को वैकल्पिकव चिकित्सा पद्धति मे अभ्यास करने वाले अभ्यार्थीे को उसके प्रमाण पत्र के दायरे में अभ्यास करने से रोकनेे या  उसके साथ अन्याय करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। जैसा कि मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरै पीठ के 2007 के आदेश क्रमांक  सी.ओ.पी.(एमडी) 8085  दिनांक 09-08-2007 के अंतर्गत है। इसके अतिरिक्त मद्रास उच्च न्यायालय की  मदुरै पीठ मे सन 2012 में दायर की गई  याचिका दिनांक 25 मार्च 2010 को दिए गए आदेश के अनुसार पुलिस कर्मचारी वैकल्पिक चिकित्सा पद्धति (पंचगव्य) के अभ्यास में हस्तक्षेप नहीं करेंगे।

Advance Diploma In Panchgavya Therapy — जून 23, 2018
संपर्क सूत्र — अप्रैल 10, 2018

संपर्क सूत्र

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          गौ परिषद पिछले काफी समय से अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्य कर रही है। गौ परिषद पहले जागृति संस्थान जिसकी स्थापना वर्ष 2002 में हुई थी, उसकी उपसमिति के रूप में कार्य कर रही थी। अब गौ परिषद का रजिस्ट्रेशन स्वतंत्र रूप से हो गया है। गौ परिषद का कार्यक्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय (इंटरनेशनल) है यानि कार्य क्षेत्र की कोई बाध्यता नहीं होगी। आप सभी हमारे साथ जुड़कर अंतरराष्ट्रीय कार्यकारिणी से लेकर ग्राम लेवल की कार्यकारिणी तक मे अपनी ईच्छा अनुसार भाग ले सकते हैं। आपका सहयोग हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होगा।

                                                                                                                                धन्यवाद

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अध्यक्ष

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प्रधान कार्यालयक

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गौ परिषद रजिस्ट्रेशन प्रमाण पत्र — अप्रैल 3, 2018

गौ परिषद रजिस्ट्रेशन प्रमाण पत्र

रजिस्ट्रेशन गौ परिषद
गौ परिषद पिछले काफी समय से अपने उद्देश्यों की पूर्ति के लिए कार्य कर रही है। गौ परिषद पहले जागृति संस्थान जिसकी स्थापना वर्ष 2002 में हुई थी, उसकी उपसमिति के रूप में कार्य कर रही थी। अब गौ परिषद का रजिस्ट्रेशन स्वतंत्र रूप से हो गया है। गौ परिषद का कार्यक्षेत्र अंतर्राष्ट्रीय (इंटरनेशनल) है यानि कार्य क्षेत्र की कोई बाध्यता नहीं होगी। आप सभी हमारे साथ जुड़कर अंतरराष्ट्रीय कार्यकारिणी से लेकर ग्राम लेवल की कार्यकारिणी तक मे अपनी ईच्छा अनुसार भाग ले सकते हैं। आपका सहयोग हमारे लिए बहुत ही महत्वपूर्ण होगा। धन्यवाद अधिक जानकारी के लिए संपर्क करें अध्यक्ष गव्यसिद्ध डॉक्टर जोराराम खोजा 94144 94759, 9950 114421
गौ परिषद कार्यकारिणीयों का गठन व कार्यप्रणाली —
सपूतों का संगठन — मार्च 11, 2017

सपूतों का संगठन

हम गौ परिषद को एक ऐसा संगठन बनाना चाहते हैं जो हिंदुओं को गौमाता के लिए एक कर सकें। हम कई वर्षों से संगठन को मजबूती के साथ खङा करने की कोशिश कर रहे लेकिन संगठन में कुछ लोग ऐसे आ जाते हैं ओर इसको अपनी राजनीति का शिकार बना लेते हैं। जैसे-जैसे संगठन बड़ा होता जाता है और आपसी  खींचा तान बढ़ती जाती है,  क्योंकि हर किसी को पद और प्रतिष्टा चाहिए। हमारे देश में तीन लोग तीन दिन तक साथ मिलकर कोई कार्य सही ढंग से नहीं कर सकते क्योंकि सब एक दूसरे की टांग खीचने में लगे हुए है। पद ओर प्रतिष्ठा पाने के लिए लड़ने लग जाते हैं और संगठन खतरे में पड़ जाता है।
आज के समय मे लोग न तो माता-पिता की सेवा कर रहे हैं, न गौ माता को रख रहे हैं,  गौमाता को कसाइयों के हाथ में दे रहे हैं, धरती माता को जहर दे रहे हैं यानी क्रषि कार्य में जमीन में यूरिया डीएपी व पोस्टीसाईड डाल कर संपूर्ण मानव जाति के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं जिससे मानव जाति मौत के कगार पर खड़ी है।क्या आप ऐसे लोगों को सपूत कह सकते हैं? इनको हम किस तरह से सपूत कह सकते हैं। हमारे यहां एक पुरानी कहावत है की पूत सपूत तो क्यों धन संचै, पूत कपूत तो क्यों धन संचै। अर्थात यदि पूत सपूत है तो भी धन संचय की जरूरत नहीं है वह अपने लिए कमा लेगा और अपना जीवन गुजारा कर लेगा और पूत कपूत है तो भी धन संचय की जरुरत नहीं है क्योंकि आपने जितना भी धन संचय किया है वह उड़ा देगा। इसलिए धन के तीन उपयोग है या तो दान-पुण्य करो तथा अच्छे कार्य में लगा दो या खा पीके मौज करो या फिर लोग खायेंगे और आपको मार देंगे और सारा धन लूट लेंगे। इसलिए मेरे कहने का तात्पर्य यह है कि हमको ऐसे लोगों के साथ मिलकर कार्य करना है जो अपने माता पिता के प्रति कर्तव्य-परायण हो उनका आदर करते हो, गौ माता के प्रति अटूट श्रद्धा और विश्वास हो एवं धरती माता को जहर मुक्त रखने का दिन रात प्रयत्न करता रहता हो, यानि जैविक खेती करता हो, प्राकृतिक खेती कहो या पौराणिक खेती करता हो एवं ईश्वर में अटूट विश्वास रखता हो। ऐसे लोगों के साथ में मिलकर हमें इस संगठन को आगे बढ़ाना है। प्रकृति का यह नियम होता है कि जो आदमी जैसा होता है उसे उसी तरह के लोग मिलते जाते हैं। हम लोग पिछले कई वर्षों से गौमाता को घर-घर स्थापित करने के लिए प्रयास कर रहे हैं उसके फल:स्वरूप एवं प्रकृति के नियमानुसार हमें भी रोज नए-नए भक्तों से मिलने का अवसर मिल रहा है एवं उनसे बात करने का सौभाग्य प्राप्त हो रहा है।
हे भगवान हमें ऐसी शक्ति दे जिससे हम हिन्दू धर्म में व्याप्त अनेक मत भिन्नता एवं अलग-अलग पंत को मानने वाले लोगों और संप्रदायों के होते हुए भी हम गौमाता, धरती माता एवं भारत माता के लिए सब को एक धागे में माला की तरह पीरो सकें। हम संपूर्ण विश्व को एक अद्भुत लोगों का संगठन देना चाहते हैं जिसमें सभी को आपस में घनिष्ठ प्रेम हो तथा एक दूसरे के लिए तन मन और धन समर्पित होने के लिए हर समय तैयार हो। उनके मन में निष्ठा और प्रेम हो, ईर्ष्या का दूर-दूर तक नामोनिशान तक दिखाई नहीं दे। हम हिंदुओं के उत्तराधिकारी के रुप में प्राप्त भयंकर अज्ञान, जाति-भेद, अंधभक्ति, पोंगा पंति यदि को दूर करके उनको एक सूत्र में बांध सकें। जो भी वैज्ञानिक तथ्य के आधार पर सनातन धर्म में परंपराएं आदि चल रही है उनका वैज्ञानिक विश्लेषण कर लोगों तक पहुंचा सके।
धन्यवाद
गौ परिषद
राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं संस्थापक
गव्यसिद्ध डॉ. जोराराम खोजा
जोधपुर राजस्थान

संगठन निर्माण — मार्च 9, 2017

संगठन निर्माण

गौ परिषद को प्रज्ञावान वीर और तेजस्वी व्यक्ति चाहिए जिसमें मृत्यु को आलिंगन करने का और समुद्र को लांग जाने का साहस हो। हमें ऐसे हजारों स्त्री-पुरुष कार्यकर्ता चाहिए जो गौ माता को पुनः घर घर स्थापित करने के लिए अपनी पूरी शक्ति लगा दे। दसों दिशाओं में गौ माता के प्रति लोगों का हृदय परिवर्तन करने एवं चरित्र निर्माण के कार्य करना ही उनका एक मात्र उद्देश्य हो कि गौ माता को पुनः घर-घर कैसे स्थापित किया जाए। जगह-जगह पंचगव्य (दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोमय) उपयोगिता के लिए केंद्र स्थापित किये जा सके और संचालित किये जा सके। सिंह के समान साहसी, परमात्मा के प्रति अटूट निष्ठा, गौ माता के प्रति अटूट प्रेम से संपन्न एवम पवित्रता की भावना से परीपूर्ण हो। हर ढाणी, ग्राम, कस्बे, नगर तथा महानगर में यानि देश के कोने-कोने में कार्यकर्ताओं की आवश्यकता है। सोशल मीडिया पर फालतू बैठकर टाइम पास करने वाले लोगों की आवश्यकता नहीं है। वे कॉल करके अपना एवं हमारा समय खराब नहीं करें। हमें ऐसे लोग चाहिए जो धरातल स्तर पर कुछ करना चाहते हैं। अधिक जानकारी के लिए हमारी वेबसाइट http://www.gouparishad.wordpress.com पर देख सकते हैं

या

इनसे संपर्क कर सकते है।

रास्ट्रीय अध्यक्ष एवं संस्थापक
गव्यसिद्ध डाँ. जोराराम खोजा (M.D. पंचगव्य थैरेपी)
e-mail – gpr.ngo@gmail.com
Phone no. – 9414494759, 9950114421