त्रिफला से कायाकल्प

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त्रिफला शब्द की बात करें तो इसका अर्थ होता है तीन फल दरअसल त्रिफला तीन ऐसे फलों को मिलाकर बनाया जाता है जो अद्वितीय गुणों से भरपूर है। इसमें पहला हरड़, दूसरा बहेड़ा और तीसरा आंवला। आयुर्वेदिक जड़ी बूटियों मे इसको हरितीकी, विभीतक और अमलकी कहा जाता है। त्रिफला बनाने के लिए इन तीनों की गुठली निकाल कर् चूर्ण बनाकर आपस में मिलाया जाता है। त्रिफला चूर्ण का विधिवत सेवन अमृत तुल्य है और कायाकल्प में समर्थ है। यह वात पित्त कफ त्रिदोष नाशक रसायन है। भारत में 3000 साल पहले एक ऋषि हुए हैं उनका नाम था वाग्भट। उन्होंने एक किताब लिखी जिसका नाम है अष्टांग हृदयम। वाग्भट ऋषि 135 साल की आयु तक जीवित रहे थे। अष्टांग हृदय में वाग्भट्ट जी कहते हैं कि जिंदगी में वात पित्त और कफ् संतुलित रखना ही सबसे अच्छी कला है और सारी जिंदगी प्रयास पूर्वक आपको एक ही काम करना है कि हमारा वात, पित और कफ् नियमित रहे, संतुलित रहे और सुरक्षित रहेा। जितना चाहिए उतना वात रहे, जितना चाहिए उतना पित रहे और जितना चाहिए उतना कफ् रहे।

त्रिफला बनाने की विधि –
दो तोला हरड़ बड़ी मंगाय। तासु दुगुन बहेड़ा लाय।।
और चतुर गुण मेरे मीता। डाल आंवला परम पुनीता।।
कूट छान या विधि से खाए। ता के रोग सर्व कट जाए।।

वैसे तो त्रिफला तीन प्रकार से तैयार किया जाता है।
नंबर (एक) त्रिफला जो बाजार में मिलता है वह समान अनुपात में मिलाया हुआ होता है, यानी तीनो हरितीकी, विभीतक और अमलकी बराबर मात्रा में होते हैं। यह त्रिफला मोटापे में सबसे अच्छा काम करता है।
नंबर (दो) त्रिफला 1ः2ः3 भाग वाला यानी 1 भाग हरड़, 2 भाग बहेड़ा और 3 आंवला होता है। यह त्रिफला कोई भी ले सकता है।
नंबर (तीसरा) त्रिफला 1ः2ः4 की मात्रा का होता है जो अनुपान के साथ खाया जाता है। अनुपान के साथ खाए जाने वाले त्रिफला के अंदर 1 भाग हरड़, 2 भाग बहेड़ा और 4 आंवला होता है। यह त्रिफला कायाकल्प करने के लिए रामबाण औषधि है।

गव्य त्रिफला –
गव्य त्रिफला बनाने के लिए सबसे पहले हरड़ को गोमूत्र छार में 21 दिनों के लिए भिगोया जाता है। बहेड़ा को 14 दिन के लिए गोमूत्र छार में भिगोया जाता है। आंवला को 7 दिन के लिए गोमूत्र छार में भिगोया जाता है। फिर इन तीनों कोगोमूत्र छार में से बाहर निकाल कर धूप में अच्छी तरह से सुखाया जाता है। सूखने के बाद अलग अलग पीसकर कपड़ छान चूर्ण बनाकर उपरोक्त विधि अनुसार मिलाया जाता है। इस विधि से बनाया गया त्रिफला उपरोक्त विधि से बनाए गए त्रिफला से 20 गुना अधिक ताकतवर होता है। इसे गोमूत्र में भावित करना भी कहते हैं।

त्रिफला की मात्रा निर्धारण –
आयुष के वर्ष प्रमाण। खाएं तोल रत्ती समान।।
ठीक यही अनुमान। वर्षों जितनी रति जान।।
सुबह उठकर हाथ मुंह धोने और खुला करने के बाद खाली पेट त्रिफला चूर्ण ताजे पानी के साथ प्रतिदिन केवल एक बार ले। मात्रा बच्चे हो या बड़े यानी जितनी उम्र होती है उतने रत्ती। यदि 8 साल की उम्र है तो 8 रत्ती। 8 रत्ती का 1 ग्राम होता है। त्रिफला सेवन के बाद 1 घंटे तक कोई भी चाय नाश्ता या खाना नहीं ले। 1 घंटे तक पानी के अलावा कुछ नहीं लेना चाहिए। एक दो तीर बार पतली दस्त भी लग सकती है। यह त्रिफला विभिन्न ऋतु में अलग-अलग अनुपान के साथ खाया जाता है।

सदैव निरोग रहने के लिए और कायाकल्प के इच्छुक व्यक्ति को चाहिए कि वे त्रिफला चूर्ण बाजार से कभी नहीं खरीदे बल्कि उपरोक्त विधि से स्वयं अपने घर पर ही एक बार इकट्ठा बनाकर 4 महीने तक उपयोग मे लाए। चार महीने बाद चूर्ण इतना प्रभावी नहीं रहता। पूर्णतया कायाकल्प के लिए त्रिफला चूर्ण 12 वर्ष तक नियमित रूप लेने का विधान है। जो व्यक्ति त्रिफला चूर्ण 12 वर्ष तक लगातार ले लेता है उसका पूर्ण रूप से कायाकल्प हो जाता है।

भिन्न-भिन्न ऋतुओं में त्रिफला सेवन विधि –
सहद चेत बैसाख बताइयो। जेठ आषाढ़ गुड़ा सु खायो।।
सावन भादो सेंधा नमक। कार्तिक कुवार खांड के संग।।
अगहन पूस सोंठ के साथ। पीपल माघ फगुन विख्यात।।

चैत्र तथा वैशाख यानी वसंत ऋतु में शहद के साथ खाया जाता है। शहद इतनी मात्रा में लेना चाहिए जितने मे अवलेह आसानी से बन जाए। जेठ तथा आषाढ़ यानी ग्रीष्म ऋतु में गुड़ के साथ खाना होता है। गुड त्रिफला के चूर्ण का चौथा भाग होना चाहिए। सावन तथा भादो वर्षा ऋतु में सेंधा नमक के साथ में खाना चाहिए। नमक त्रिफला चूर्ण का 8 वा भाग होना चाहिए। अश्विन और कार्तिक में देसी खांड के साथ खाना चाहिए। देसी खांड त्रिफला चूर्ण की 6 वा भाग होनी चाहिए। अगहन पूस सोंठ चूर्ण के साथ खाना चाहिए। सोंठ त्रिफला चूर्ण का 8 वा भाग होना चाहिए। माघ और फागुन में पीपल के साथ में खाना चाहिए। पीपल त्रिफला चूर्ण का 8 वा भाग होना चाहिए।

अनुमान के साथ त्रिफला खाने के लाभ –
प्रथम वर्ष तन सुस्ती जाए। द्वितीय रोग सर्व मिट जाए।।
तृतीय नयन बहु ज्योति समावे। चौथे सुंदरताई आवे।।
पंचम वर्ष बुद्धि अधिकाई। षस्टम महाबली होई जाई।।
केस श्वेत श्याम हुई सप्तम। वृद्ध तन तरुण होई पुनः अष्टम।।
दिन में तारे दिखे सही। नवम वर्ष फल अस्तुत कहीं।।
दशम शारदा कंठ विराजे। अंधकार हृदय का भाजे।।
जो एकादश द्वादश खाए। ताको वचन सिद्ध हो जाए।।

त्रिफला उपरोक्त विधि से लगातार 12 वर्ष तक यदि कोई खाता है तो पहले वर्ष मे सुस्ती दूर भाग जाती है। दूसरे वर्ष मे सभी रोगों का नाश होता है। तीसरे वर्ष मे नेत्रों की ज्योति बढ़ती है। चौथे वर्ष मे चेहरे पर निखार आता है। पांचवे वर्ष मे बुद्धि का विकास होता है। छठे वर्ष मे बल की वृद्धि होती है। सातवें वर्ष मे सफेद बाल काले होते हैं। आठवें वर्ष मे व्यक्ति युवा बन जाता है। नो वे वर्ष में दिन में तारे स्पष्ट दिखने लगते हैं। दसवे वर्ष कंठ में सरस्वती का वास हो जाता है एवं हृदय में प्रकाश की अनुभूति होती है। 11 व 12 वे वर्ष बरस में वचनसिद्धि प्राप्त हो जाती है। अर्थात सेवन करने वाला व्यक्ति इतना समर्थ हो जाता है कि जो भी वचन बोले खाली नहीं रहता बल्कि सत्य सिद्ध होता है। इसी बात को उपरोक्त कविता के रूप में भी कहा गया है।

उपरोक्त गिनाए गए लाभ भले ही आज अतिशयोक्ति पूर्ण लगे परंतु इतना जरूर है कि वास्तविक लाभ कायाकल्प के समकक्ष होते हैं। अर्थात शरीर में कैसी भी बीमारी हो स्थाई रूप से ठीक हो जाती है और व्यक्ति मृत से युवा जैसा हो जाता है।

लेखक –
गव्यसिद्ध डॉक्टर जोराराम खोजा
अध्यक्ष गौ परिषद ( अंतरराष्ट्रीय गैर सरकारी संगठन)
पंचगव्य अनुसंधान आश्रम( गुरुकुल)

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